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Thursday, April 25, 2019

कोहरा.....


अक्सर मेरी खिड़की से मुझे गाँधी मंडप के उस झंडे का नज़ारा होता है ..... हर बार तुमसे फ़ोन पर बतियाते मैं इसको देखा करता हूँ .....
सर्दी की इस सुबह में आज धुंध गहराई हुई है.....

दूर तक साफ़ देखने में दिक्कत मालूम पड़ती है और झंडा भी कोहरे में कहीं गुम है.....
झंडे का नज़ारा न होने में.....और कोहरे के होने में;
कहीं न कहीं तुम्हारे होने का एहसास है......


1 comment:

  1. हर बार जब पीछे मुडकर देखती हूँ तो तुम नज़र आते हो,
    कितने खास थे तुम ये अहसास कराते हो
    पर अब गुम हो तुम गुम हूँ मैं,
    शायद खुश हो तुम आस तो है
    पर मैं उसमें शामिल नहीं मुझे अहसास भी है
    "To all the boys I have loved before" की तरह यह भी एक चिट्ठी है, बस तुमको चाहते नहीं है पर अपना मानते हैं

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