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Sunday, April 21, 2019

मनाली




शायद.....शायद आपके होश में न होना ही होश के सबसे तीव्र एहसास तक लाकर छोड़ता है.....
ठीक उसी तरह जैसे मृत्यु शैय्या पे लेटे हुए बेबस इंसान को जिंदगी से,सुख,चैन,खुशी से सुहाना कुछ नही लगता..... 
ऐसे ही एक एहसास में पाँव जब ठंड से थोड़ा सुन्न पड़ने लगते हैं तो दूर पहाड़ों पर चमकती हुई मद्धम सी रोशनियों और सामने बह रहे दरिया की मद्धम आवाज़ कानों में पड़ती है और तब शायद जीवन का एहसास होता है .....

एहसास यूँ तो कई दफा किया होगा पर यह एहसास कुछ ठंड की ठिठुरन की तरह हड्डियों से होते हुए मन तक पहुचने वाला आंतरिक रूपी एहसास होता है.....इसी एहसास को ज़हन में भरते-भरते मन के किसी कोने में गूंजता है कि 'रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है' और हम गुलज़ार साहब की कविताओं के समर्थन या यूँ कहें आश्रय में आ खड़े होते हैं.....

और दूर पहाड़ों के बीच पेड़ों को छूकर बादल गुज़र रहे होते हैं,मानो उनमें एक लय हो.....और बादलों को जब गौर से सुना जाता है तो एक काफ़िला यह कहते हुए गुजरता है के 'ज़रा मौसम तो बदला है,मगर ज़र्द शाखों पे नए पत्ते आने में अभी कुछ दिन लगेंगे' ,
पास में दूर पहाड़ों पे टिमटिमाती हुई मद्धम रोशनी उस कड़ाके की ठंड में ठिठुरती हुई बादलों की स्वीकृति में हाँ में हाँ मिलाये जाती है..... इस सब के गवाह ये 'पर्वत',ये 'रात' और 'हम' इस प्रकृति के खेल पर मंत्र-मुग्ध हुए जाते हैं.....

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